16 हजार मेगावाट तक पहुंची बिजली की मांग..कटौती से बढ़ी मुश्किलें, समाधान की राह पर डॉ मोहन सरकार
नवरात्र के त्योहार के बीच..मध्यप्रदेश में बिजली की बढ़ती मांग और अघोषित कटौती ने सरकार के सामने एक ऐसी चुनौती खड़ी की है, जिसका सीधा संबंध किसानों की खेती, ग्रामीण जनजीवन और आम उपभोक्ताओं की रोजमर्रा की जरूरतों से है। मंदसौर, राजगढ़, सीहोर, बड़वानी, धार, झाबुआ, खंडवा, आगर मालवा, नर्मदापुरम और बुरहानपुर सहित कई जिलों में बिजली कटौती के खिलाफ प्रदर्शन हुए हैं। कहीं ग्रामीणों ने बिजली ग्रिडों का घेराव किया, तो कहीं चक्काजाम और ज्ञापन के जरिए अपनी परेशानी सामने रखी। किसानों की चिंता भी वाजिब है, क्योंकि रबी सीजन की तैयारियों के बीच सिंचाई के लिए नियमित बिजली की उपलब्धता बेहद जरूरी है। ऐसे में चुनौती केवल बिजली की बढ़ती मांग को पूरा करने की नहीं, बल्कि लोगों की अपेक्षाओं और जरूरतों के अनुरूप आपूर्ति सुनिश्चित करने की भी है।
इस स्थिति के बीच मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का कैबिनेट बैठक में बिजली कटौती के मुद्दे पर चर्चा करना और सप्ताहभर में समाधान निकालने का भरोसा देना महत्वपूर्ण है। इससे स्पष्ट है कि सरकार के सामने समस्या को केवल विभागीय विषय मानकर टालने के बजाय उसके व्यापक जनजीवन पर पड़ने वाले प्रभाव को देखते हुए समाधान तलाशने की जरूरत है। जब बिजली कटौती का असर गांवों,शहरी क्षेत्रों से लेकर राजनीतिक गलियारों तक पहुंचने लगे और सत्तारूढ़ दल के विधायक भी मुख्यमंत्री तथा अधिकारियों से नियमित आपूर्ति की मांग करने लगें, तब समस्या की गंभीरता को समझना और त्वरित कार्रवाई करना स्वाभाविक अपेक्षा बन जाती है।
बिजली की मांग में अचानक हुई बढ़ोतरी ने इस चुनौती को और जटिल बनाया है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 11 अक्टूबर को प्रदेश में बिजली की मांग करीब 16 हजार मेगावाट तक पहुंच गई, जबकि पिछले वर्ष इसी दिन यह लगभग 11 हजार मेगावाट थी। यानी मांग में करीब 40 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। उत्पादन के कुछ स्रोतों की सीमाओं के बीच इतनी तेजी से बढ़ती मांग का प्रबंधन आसान नहीं है। सरकार के सामने फिलहाल सबसे बड़ी प्राथमिकता ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में बिजली आपूर्ति को व्यवस्थित करना है। कई स्थानों से दो से आठ घंटे तक कटौती की शिकायतें सामने आई हैं। रात में बिजली नहीं मिलने से ग्रामीणों की परेशानी बढ़ती है, जबकि सिंचाई प्रभावित होने की आशंका किसानों की चिंता को और गहरा करती है। रबी की बुवाई का समय नजदीक होने के कारण यह विषय और संवेदनशील हो गया है। ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर ने अधिकारियों को रबी सीजन में किसानों को 10 घंटे बिजली उपलब्ध कराने के निर्देश तो दे दिए हैं लेकिन अब जरूरी है कि इन निर्देशों का जमीन पर प्रभावी क्रियान्वयन हो और किसानों को तय अवधि में बिजली मिले।
भारतीय किसान संघ की ओर से दशहरे तक समस्या के समाधान का अल्टीमेटम भी सरकार के लिए समयबद्ध कार्रवाई का संकेत है। ऐसे में केवल आश्वासन पर्याप्त नहीं होंगे, बल्कि जिलेवार बिजली मांग, आपूर्ति और कटौती की वास्तविक स्थिति की समीक्षा कर प्रभावित क्षेत्रों की पहचान करनी होगी। जहां तकनीकी या उत्पादन संबंधी बाधाएं हैं, वहां उनके निराकरण के लिए स्पष्ट कार्ययोजना बनानी होगी। साथ ही, बिजली कटौती की स्थिति में उपभोक्ताओं को समय पर जानकारी देना और शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई करना भी जरूरी है।
मुख्यमंत्री स्तर पर हुई चर्चा और ऊर्जा विभाग के निर्देश इस दिशा में पहल का अवसर हैं। अब सरकार की संवेदनशीलता का वास्तविक आंकलन इस बात से होगा कि किसानों को सिंचाई के लिए नियमित बिजली मिले, ग्रामीण परिवारों की परेशानी कम हो और शहरी क्षेत्रों की शिकायतों का समाधान समय पर हो। बढ़ती मांग के बीच बिजली व्यवस्था को संतुलित रखना आसान नहीं, लेकिन समयबद्ध फैसलों, विभागीय समन्वय और जमीनी निगरानी से इस चुनौती को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। यही वह रास्ता है, जिससे लोगों को राहत देने के साथ सरकार के प्रति भरोसा भी मजबूत होगा। और इसी दिशा में मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव और उनकी सरकार बढ़ रही है.




