विजय दशमी के पावन अवसर पर जहां पूरे देश में रावण का पुतला जलाकर बुराई पर अच्छाई की विजय का पर्व मनाया जाता है, वहीं पंजाब के लुधियाना जिले के पायल कस्बे में इसके बिल्कुल विपरीत अनूठी परंपरा निभाई जाती है। यहां रावण के पुतले दहन के स्थान पर उसकी विशेष पूजा-अर्चना और राजतिलक किया जाता है। स्थानीय दुबे परिवार पिछले नौ दशकों और पीढ़ियों से यानी करीब 185 वर्षों से इस अद्भुत परंपरा को पूरी श्रद्धा के साथ आगे बढ़ा रहा है।
1835 से चली आ रही ऐतिहासिक परंपरा
पायल शहर के ऐतिहासिक राम मंदिर में भगवान श्रीराम के साथ-साथ रावण की भी स्थायी मूर्ति स्थापित है। इस परंपरा के आरंभ के पीछे एक रोचक किंवदंती जुड़ी है। कहा जाता है कि दुबे परिवार के पूर्वज बीरबल दास अपनी संतानहीनता से दुखी होकर घर छोड़कर हरिद्वार की ओर जा रहे थे, तभी मार्ग में एक संत ने उन्हें वापस लौटकर रामलीला और दशहरा उत्सव आयोजित करने का परामर्श दिया। इसके उपरांत उनके घर चार पुत्रों का जन्म हुआ, जिसके बाद से यह परिवार और पूरा स्थानीय समाज रावण को विद्वान मानकर उसका आदर करने लगा। उपलब्ध दस्तावेजों के मुताबिक यह प्राचीन मंदिर वर्ष 1835 में निर्मित हुआ था।
मदिरा भोग और रक्त से राजतिलक की अनूठी रस्म
इस स्थान पर दशहरे के दिन की जाने वाली पूजा-विधि बेहद भिन्न होती है। सूर्यास्त तक चलने वाली इस विशेष आराधना में रावण की प्रतिमा को मदिरा का भोग अर्पित किया जाता है। इसके पश्चात, एक बकरे के कान पर हल्का सा चीरा लगाकर उससे प्राप्त रक्त की बूंदों से रावण का राजतिलक किया जाता है। अंत में मूर्ति के मस्तक पर हल्की अग्नि प्रज्वलित की जाती है, जिसे यहाँ के निवासी अत्यंत मंगलकारी मानते हैं। स्थानीय जनमानस का यह विश्वास है कि रावण मात्र अधर्म का प्रतीक नहीं था, बल्कि वह वेदों का मर्मज्ञ, प्रकांड विद्वान और देवाधिदेव महादेव का अनन्य भक्त भी था।
नई पीढ़ी और जन-आस्था का संगम
इस विशिष्ट रीति-रिवाज से केवल दुबे परिवार ही नहीं, बल्कि संपूर्ण पायल क्षेत्र की भावनाएं जुड़ी हुई हैं। यहाँ के निवासियों का अटूट विश्वास है कि इस मंदिर में सच्चे हृदय से जो भी मनोकामना मांगी जाती है, वह अवश्य पूर्ण होती है। रामलीला में वर्षों से रावण की भूमिका निभा रहे कलाकारों और ग्रामवासियों का यह साझा प्रयास आने वाली युवा पीढ़ी को उनकी अनूठी सांस्कृतिक थाती और इतिहास से जोड़े रखने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।






