Ashish Usha Agarwal को याद करने की कुछ अपनी वजहें हैं!

 

लेखक—धर्मेंद्र त्रिवेदी,वरिष्ठ पत्रकार

भोपाल की मेज पर रखा लौंग-इलायची का जार, नाम के साथ मां का नाम और ग्वालियर का अपनापन…
Ashish Usha Agarwal को याद करने की कुछ अपनी वजहें हैं!
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कुछ लोग अपनी पहचान पदों से बनाते हैं, कुछ अपनी उपलब्धियों से और कुछ ऐसे होते हैं, जिनकी पहचान उनके व्यवहार, रिश्तों और लोगों के मन में बनाई गई जगह से होती है। आशीष अग्रवाल का जन्मदिन है, बीते समय को याद करता हूं तो व्यक्तित्व के कई दृश्य एक साथ आंखों के सामने आ जाते हैं। भोपाल भाजपा कार्यालय की एक मेज, उस पर रखा कांच का छोटा-सा जार, उसमें रखी लौंग और इलायची, ग्वालियर में उनसे मिलने पहुंचने वाले लोगों के प्रति उनका अपनापन और पत्रकारों के साथ बिना किसी औपचारिक दूरी के होने वाला संवाद। ये छोटी-छोटी बातें हैं, लेकिन शायद किसी व्यक्ति को समझने के लिए उसके बारे में लिखे गए बड़े-बड़े परिचय से ज्यादा महत्वपूर्ण होती हैं।

भोपाल भाजपा कार्यालय में मीडिया प्रभारी की मेज पर रखा लौंग-इलायची का जार मुझे ग्वालियर आने के बाद भी याद है। उसमें रखी लौंग और इलायची को लेकर एक बड़ा दिलचस्प विचार मन में आया कि आदमी को अपना पेट और गला, दोनों स्वच्छ रखना जरूरी है। बात हल्के-फुल्के अंदाज में कही जाती थी, लेकिन ऐसी छोटी बातें ही किसी व्यक्ति के स्वभाव को यादगार बनाती हैं। सार्वजनिक जीवन की आपाधापी में भी जीवन को सहजता से लेने का उनका यह अंदाज अलग ही अनुभव कराता था।

आशीष को याद करते हुए एक और बात मन में आती है। वे अपने नाम के साथ अपनी मां का नाम भी जोड़कर रखते हैं “आशीष ऊषा अग्रवाल।”

आज के समय में, जब लोग अपनी पहचान के साथ पद, उपाधि और उपलब्धियां जोड़ने में संकोच नहीं करते, तब अपने नाम के साथ मां का नाम जोड़कर रखना मुझे एक अलग ही भाव से भर देता है। यह केवल नाम लिखने की शैली नहीं है। इसमें मां के प्रति लगाव, उनके अस्तित्व के प्रति स्वीकार और जीवन में उनके योगदान के प्रति कृतज्ञता का भाव दिखाई देता है। एक मां अपने बच्चों को केवल जन्म नहीं देती, वह उनके भीतर संस्कार, संघर्ष करने की क्षमता और दुनिया को देखने का नजरिया भी विकसित करती है। आशीष के व्यक्तित्व में मां के प्रति यह सम्मान सार्वजनिक रूप से भी दिखाई देता है। मुझे इसमें स्त्री शक्ति के प्रति सम्मान का एक सहज संदेश भी नजर आता है। यह कोई भाषण नहीं, किसी मंच से किया गया दावा नहीं, बल्कि अपने नाम के साथ मां को स्थान देने का एक व्यक्तिगत निर्णय है। कई बार व्यक्ति के छोटे-से निर्णय उसके विचारों के बारे में बहुत कुछ कह जाते हैं।

एक पत्रकार की दृष्टि से किसी व्यक्ति को समझने का मेरा तरीका थोड़ा अलग है।
पत्रकारिता में लंबे समय तक काम करते हुए अनेक तरह के व्यक्तित्वों से मिलने, उन्हें देखने और उनके व्यवहार को समझने का अवसर मिला है। राजनीति में ऐसे लोग भी देखे हैं, जिनके आसपास पद के कारण भीड़ रहती है और ऐसे भी, जिनके आसपास लोग अपनेपन के कारण पहुंचते हैं। इन दोनों में बहुत अंतर होता है। पद पर बैठे व्यक्ति से लोग काम के लिए मिलते हैं, लेकिन जिसके व्यवहार में आत्मीयता होती है, उससे लोग बिना किसी काम के भी मिलने पहुंचते हैं।

आशीष के साथ मेरी एक महत्वपूर्ण अनुभूति यही रही है।
ग्वालियर का कोई व्यक्ति उनसे मिलने पहुंच जाए तो वे उसे कभी यह महसूस नहीं होने देते कि वह किसी बड़े पद पर बैठे नेता के सामने खड़ा है। बातचीत का अंदाज ऐसा होता है कि सामने वाला अपनेपन का अनुभव करता है। उसे यह नहीं लगता कि वह किसी औपचारिक मुलाकात में आया है, बल्कि ऐसा महसूस होता है जैसे अपने किसी परिचित, मित्र या परिवार के सदस्य के पास पहुंचा हो। पत्रकारों के साथ उनका व्यवहार भी इसी स्वभाव को प्रकट करता है। पत्रकारिता और राजनीति के बीच संबंध हमेशा आसान नहीं होते। पत्रकार के पास सवाल होते हैं, कभी असहमति होती है, कभी किसी विषय पर तीखी प्रतिक्रिया भी होती है। राजनीतिक व्यक्ति के लिए यह सब सहजता से स्वीकार करना हमेशा आसान नहीं होता। लेकिन संवाद बनाए रखना और पत्रकारों से आत्मीयता के साथ मिलना एक अलग तरह का व्यक्तित्व मांगता है।

आशीष के साथ पत्रकारों का जुड़ाव मुझे इसी सहजता का परिणाम लगता है। बातचीत में अनावश्यक औपचारिकता नहीं, मिलने में पद का अहसास नहीं और संवाद में एक स्वाभाविक अपनापन। एक पत्रकार के रूप में मैं यह भी मानता हूं कि किसी राजनीतिक व्यक्ति का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि वह कितनी प्रभावशाली बात करता है या मीडिया में कितनी बार दिखाई देता है। यह भी देखना चाहिए कि वह अपने आसपास के लोगों को कितना महत्व देता है, असहज सवालों के बीच संवाद की कितनी गुंजाइश छोड़ता है और अपने पुराने साथियों के प्रति उसका व्यवहार कैसा रहता है।

आशीष की यात्रा को भी इसी संदर्भ में देखना मुझे अच्छा लगता है।

बैंकिंग क्षेत्र से अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत करने के बाद 2010 से भाजपा के साथ उनकी सक्रिय राजनीतिक यात्रा आगे बढ़ी। संगठन में मीडिया पैनल से लेकर प्रदेश प्रवक्ता, प्रदेश मीडिया प्रभारी और अब राष्ट्रीय मीडिया संयोजक तक पहुंचना एक लंबी प्रक्रिया का परिणाम है। इस दौरान जिम्मेदारियां बदलीं, कार्यक्षेत्र बढ़ा और अनुभव का दायरा भी विस्तृत हुआ। मां से मिले संस्कारों और संगठन के प्रति समर्पण की चर्चा उनके जीवन के साथ जुड़ी रही है। उनके लिए संगठन में काम करना केवल एक राजनीतिक गतिविधि नहीं, बल्कि एक भावनात्मक प्रतिबद्धता भी दिखाई देता है।

लेकिन किसी भी संगठन की वास्तविक ताकत उसके बड़े पदाधिकारी नहीं, बल्कि वे कार्यकर्ता होते हैं, जो बिना किसी अपेक्षा के दिन-रात काम करते हैं। वे कार्यकर्ता जो पोस्टर लगाते हैं, कार्यक्रमों की व्यवस्था करते हैं, भीड़ जुटाते हैं, लोगों को जोड़ते हैं और कई बार अपनी निजी जिंदगी के महत्वपूर्ण समय को संगठन के लिए दे देते हैं।
एक कार्यकर्ता की सबसे बड़ी इच्छा यही होती है कि संगठन में आगे बढ़ने वाला व्यक्ति उसे भूले नहीं। उसे मिलने पर ऐसा न लगे कि उसके और नेतृत्व के बीच कोई दीवार खड़ी हो गई है।
मेरे विचार से आशीष के व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्ण पक्ष यही है कि वे कार्यकर्ताओं के साथ रिश्तों को केवल संगठनात्मक औपचारिकता तक सीमित नहीं रखते। ग्वालियर का कोई कार्यकर्ता या परिचित उनसे मिलने पहुंचे तो उसे अपनेपन का अनुभव हो, यही बात किसी भी संगठनात्मक व्यक्ति की वास्तविक पूंजी होती है।
पद मिलने के बाद कही गई आशीष की एक बात मुझे विशेष रूप से याद रह गई। उन्होंने कहा है कि दिल्ली में रहने के बावजूद वे अपने लोगों के लिए ‘आपका अपना’ बने रहेंगे। वरिष्ठों के लिए बेटा, युवाओं के लिए बड़ा भाई और सबके लिए परिवार के सदस्य की तरह।

यह बात मुझे इसलिए भी अच्छी लगी क्योंकि सार्वजनिक जीवन में आगे बढ़ने के बाद सबसे कठिन काम अपने पुराने रिश्तों को उसी सहजता से निभाना होता है। बड़े शहर, बड़ी जिम्मेदारियां और व्यस्तताएं कई बार व्यक्ति को उसके पुराने संसार से दूर कर देती हैं। लेकिन अपने लोगों के बीच लौटकर वही पुराना अपनापन बनाए रखना एक अलग बात है। भोपाल से ग्वालियर और अब दिल्ली तक आशीष की यात्रा को देखता हूं तो लगता है कि इन तीनों शहरों ने उनके जीवन के अलग-अलग अध्याय देखे हैं। भोपाल ने उनकी संगठनात्मक सक्रियता को करीब से देखा, ग्वालियर ने उनके साथ अपनेपन का रिश्ता महसूस किया और दिल्ली ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर काम करने का बड़ा अवसर दिया। राष्ट्रीय मीडिया संयोजक के रूप में अब उनके सामने बड़ी जिम्मेदारी है। देश की राजनीति में मीडिया की भूमिका तेजी से बदल रही है। सूचना की गति, राजनीतिक विमर्श का विस्तार और संवाद की नई चुनौतियां इस दायित्व को पहले से अधिक महत्वपूर्ण बनाती हैं। संगठन की विचारधारा, नीतियों और सरकार के काम को प्रभावी ढंग से जनता तक पहुंचाना केवल मीडिया प्रबंधन नहीं, बल्कि समझ, धैर्य, वैचारिक स्पष्टता और संवाद-कौशल की भी परीक्षा है।

आशीष के सामने अब यही व्यापक दायित्व है।

लेकिन आज उनके जन्मदिन पर मैं उनकी राजनीतिक उपलब्धियों या जिम्मेदारियों की सूची दोहराना नहीं चाहता। उनकी राजनीतिक यात्रा अपनी जगह है, लेकिन व्यक्तिगत रूप से मुझे उनके व्यक्तित्व की वे छोटी बातें ज्यादा याद आती हैं, जो किसी प्रेस विज्ञप्ति या राजनीतिक परिचय में कभी दर्ज नहीं होतीं। भोपाल की मेज पर रखा लौंग-इलायची का जार, अपने नाम के साथ मां के नाम को सम्मानपूर्वक स्थान देना, ग्वालियर से मिलने पहुंचे व्यक्ति को अपनेपन का अनुभव कराना और पत्रकारों के साथ सहज संवाद बनाए रखना।

इन सबके बीच एक बात समान है,रिश्तों को महत्व देना।

जन्मदिन पर किसी व्यक्ति को मिलने वाली शुभकामनाओं की संख्या से उसकी वास्तविक कमाई का पता नहीं चलता। उसकी वास्तविक कमाई तो उन लोगों की भावनाओं में होती है, जो उसकी सफलता से खुश होते हैं। उन कार्यकर्ताओं के विश्वास में होती है, जो उसे अपना मानते हैं। उन पत्रकारों के आत्मीय संबंधों में होती है, जो राजनीतिक मतभेदों के बावजूद उससे सहजता से संवाद कर पाते हैं। और उन पुराने मित्रों की स्मृतियों में होती है, जिनके लिए वह आज भी पहले जैसा ही है।

आशीष भाई, आपके जन्मदिन पर मेरी यही कामना है कि आपकी यात्रा निरंतर आगे बढ़े। संगठन में नई जिम्मेदारियां मिलें, आपके अनुभव का विस्तार हो और आपकी मेहनत को नई पहचान मिले। लेकिन अपने नाम के साथ मां का नाम जोड़ने वाला यह भाव हमेशा बना रहे। भोपाल की स्मृतियां, ग्वालियर का अपनापन और पुराने साथियों के साथ सहज संवाद आपकी व्यस्तताओं में भी जगह पाते रहें। आपके जीवन में सफलता के नए अध्याय जुड़ें, लेकिन वे लोग कभी न छूटें जिनके बीच से आपकी यात्रा शुरू हुई थी।

जन्मदिन की बहुत-बहुत शुभकामनाएं आशीष ऊषा अग्रवाल जी!

ईश्वर आपको उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु और ऊर्जा प्रदान करें। मां का आशीर्वाद सदैव बना रहे और आपके जीवन में ऐसी उपलब्धियां जुड़ती रहें, जिनकी खुशी केवल आपको नहीं, बल्कि आपके अपने लोगों को भी हो। आखिरकार, पद व्यक्ति को पहचान दे सकता है, उपलब्धियां उसे ऊंचाई दे सकती हैं, लेकिन लोगों के मन में बना अपनापन ही उसे उनका अपना बनाता है।

जन्मदिन मंगलमय हो।

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