‘घर वापसी’..’रूठों की मान-मनुहार’ या ‘कांग्रेस की मरम्मत’?

—नगरीय निकाय चुनाव और 2028 के लिए मजबूरी या पटवारी की सियासी जरूरत?
—लौटने वालों को सीधे तवज्जो मिली, तो क्या पुराने कार्यकर्ताओं में बढ़ेगी नाराजगी

मध्य प्रदेश कांग्रेस में घर वापसी अभियान की आहट है..प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी का दावा है कि पार्टी छोड़कर गए नेताओं और कार्यकर्ताओं के करीब 600 आवेदन उनके पास पहुंचे हैं..इनमें 200 से अधिक पूर्व विधायक और अध्यक्ष स्तर के नेताओं के आवेदन होने की बात भी कही गई है..दावा बड़ा है, लेकिन सवाल उससे भी बड़ा है..क्या कांग्रेस के दरवाजे पर सचमुच लौटने वालों की कतार लगी है या फिर यह 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले बिखरे संगठन को समेटने की ये एक राजनीतिक कोशिश है? और अगर ये नेता लौटना चाहते हैं, तो आखिर ऐसा क्या बदल गया कि सत्ता की दहलीज देखकर पार्टी छोड़ने वाले अब पुराने घर की चौखट पर दस्तक दे रहे हैं?

इस सवाल का जवाब समझने के लिए मध्य प्रदेश की राजनीति के पिछले छह साल के पन्ने पलटने होंगे..10 मार्च 2020..वह तारीख, जब ज्योतिरादित्य सिंधिया की बगावत और उनके साथ 22 विधायकों के इस्तीफे ने कमलनाथ सरकार को संकट में डाल दिया..इसके बाद अन्य विधायकों के इस्तीफों से उपचुनाव का रास्ता खुला..28 सीटों पर हुए उपचुनाव में भाजपा ने 19 सीटें जीतीं, जबकि कांग्रेस को 9 सीटों पर संतोष करना पड़ा..कांग्रेस की सत्ता गई और भाजपा की वापसी हुई..यह सिर्फ सरकार बदलने की घटना नहीं थी, बल्कि इसने मध्य प्रदेश की राजनीति में दलबदल को सत्ता तक पहुंचने के एक प्रभावी रास्ते के रूप में स्थापित कर दिया.

इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले दलबदल की राजनीति ने फिर रफ्तार पकड़ी..कांग्रेस के अमरवाड़ा विधायक कमलेश शाह भाजपा में चले गए..पूर्व मंत्री रामनिवास रावत ने भी कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया..पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुरेश पचौरी समेत कई नेताओं ने पाला बदला..विधायक निर्मला सप्रे के भाजपा में जाने से भी कांग्रेस को झटका लगा..भाजपा ने इस दौर में नेताओं को जोड़ने के लिए बाकायदा न्यू ज्वाइनिंग टोली बनाई, जिसकी कमान वरिष्ठ नेता नरोत्तम मिश्रा को सौंपी गई..संदेश साफ था..एक तरफ कांग्रेस के खेमे से निकासी हो रही थी, दूसरी तरफ भाजपा अपने कुनबे का विस्तार कर रही थी..लेकिन राजनीति में हर दलबदल स्थायी ठिकाना नहीं बनता..रामनिवास रावत का उपचुनाव हारना इस बात की याद दिलाता है कि पार्टी बदलने से चुनावी जीत की गारंटी नहीं मिलती..और सत्ता के साथ खड़े होने का फैसला संगठन में सम्मान, राजनीतिक भविष्य और जनता के भरोसे की गारंटी भी नहीं देता..यही वह बिंदु है, जहां कांग्रेस के घर वापसी अभियान की संभावनाएं और उसकी सीमाएं, दोनों दिखाई देती हैं..2028 के विधानसभा चुनाव में अभी वक्त है, लेकिन कांग्रेस के लिए तैयारी का समय अब ही है..ग्वालियर-चंबल इसका बड़ा उदाहरण है..कांग्रेस के सामने केवल नेताओं की कमी नहीं आई, बल्कि कई सीटों पर मजबूत चेहरे, स्थानीय नेटवर्क और चुनावी प्रबंधन का संकट भी खड़ा हुआ.

कांग्रेस और कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी के सामने चुनौती दोहरी है..उन्हें एक ओर पार्टी छोड़ चुके नेताओं को लौटने के लिए भरोसा देना है, दूसरी ओर उन कार्यकर्ताओं को भी जवाब देना है जो मुश्किल वक्त में कांग्रेस के साथ खड़े रहे..अगर लौटने वालों को सीधे तवज्जो मिली, तो पुराने कार्यकर्ताओं में नाराजगी बढ़ सकती है..और अगर दरवाजे बंद रखे गए, तो कमजोर सीटों पर कांग्रेस अपने संभावित राजनीतिक संसाधनों से हाथ धो सकती है..यानी घर वापसी का रास्ता खुला रखना भी रणनीति है और उसके लिए स्पष्ट नियम बनाना भी..मध्य प्रदेश की राजनीति में दल बदल कोई नई परिघटना नहीं, लेकिन हर दौर में उसका असर अलग रहा है..कभी सरकारें गिरीं, कभी संगठन कमजोर हुए और कभी चुनावी नतीजों ने दलबदल की चमक फीकी कर दी.

अब सबसे अहम सवाल यही है कि जीतू पटवारी के पास आए 600 आवेदन आखिर किस तरह की वापसी का संकेत हैं? क्या इनमें बूथ स्तर पर काम करने वाले कार्यकर्ता हैं, जिनसे संगठन को ताकत मिलेगी? क्या ऐसे पूर्व विधायक और नेता हैं, जो अपने क्षेत्र में अब भी प्रभाव रखते हैं? या फिर यह उन चेहरों की सूची है जो चुनाव नजदीक आते ही टिकट और राजनीतिक संभावना का हिसाब लगाने लगते हैं? आवेदन संख्या से ज्यादा महत्वपूर्ण उनकी राजनीतिक उपयोगिता, जनाधार और वापसी की शर्तें होंगी..कांग्रेस के लिए घर वापसी अभियान केवल रूठों को मनाने का कार्यक्रम नहीं हो सकता..यह टूटे संगठन की मरम्मत, कमजोर सीटों पर नए समीकरण बनाने और कार्यकर्ताओं का भरोसा लौटाने की परीक्षा है..लेकिन पार्टी को यह भी तय करना होगा कि वापसी का दरवाजा विचारधारा और संगठन के लिए खुलेगा या सिर्फ चुनावी गणित के लिए..

2028 में सत्ता की लड़ाई जीतने के लिए कांग्रेस को चेहरे जरूर चाहिए, लेकिन केवल लौटे हुए चेहरे पर्याप्त नहीं होंगे..उसे बूथ पर सक्रिय कार्यकर्ता, स्थानीय नेतृत्व, स्पष्ट रणनीति और जनता के बीच विश्वसनीय विकल्प भी खड़ा करना होगा..वरना घर वापसी की तस्वीरें तो बन जाएंगी, मगर चुनावी जमीन नहीं बदलेगी..कुल मिलाकर जीतू पटवारी के सामने असली चुनौती नेताओं को कांग्रेस में वापस लाने की नहीं, बल्कि कांग्रेस में लौटने को राजनीतिक रूप से सार्थक बनाने की है..क्योंकि सवाल यह नहीं कि कितने लोग घर लौटना चाहते हैं..सवाल यह है कि उनके लौटने से कांग्रेस कितनी मजबूत होगी और क्या यह मजबूती 2028 में वोटों में भी तब्दील हो पाएगी?

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