ये हिंसा कब रुकेगी?:मणिपुर दहल रहा है, कई लोग मारे जा चुके लेकिन समाधान अभी भी दूर

मणिपुर दहल रहा है। जल रहा है। लोग अपने भरे- पूरे घर छोड़कर दूसरे राज्यों के, दूसरे शहरों में, यहाँ- वहाँ रिश्तेदारों, पहचान वालों के पास शरण ले रहे हैं। हिंसा के चलते पूरा महीना बीत गया, लेकिन हिंसा रुकने का नाम नहीं ले रही है। सुरक्षा बलों को सख़्ती से निबटने के आदेश देने के सिवाय सरकार और कुछ कर नहीं पा रही है।
मूल समस्या क्या है? उसे कैसे निबटाया जाए? इस ओर कोई कॉन्क्रीट प्रयास अब तक दिखाई नहीं देते। कोई इन हिंसात्मक घटनाओं में जुटे लोगों को उग्रवादी कह रहा है, कोई आतंकवादी! दरअसल, ये आदिवासी समूह हैं। एक तरफ़ कुकी- चिन जनजातियाँ हैं और दूसरी तरफ़ इम्फ़ाल घाटी में बसे मैतेई हैं। दोनों के बीच हक़ की लड़ाई है। एक तरह से कहा जा सकता है कि यह ज़मीन का झगड़ा है।
अमित शाह ने हिंसा में मारे गए लोगों के परिजनों को 10-10 लाख रुपए की सहायता राशि और परिवार के एक सदस्य को नौकरी देने की घोषणा की है।
अमित शाह ने हिंसा में मारे गए लोगों के परिजनों को 10-10 लाख रुपए की सहायता राशि और परिवार के एक सदस्य को नौकरी देने की घोषणा की है।
वास्तव में मणिपुर की पहाड़ियों में नगा और कुकी के बीच ज़मीनों का झगड़ा 1990 के दशक में भी हो चुका

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