‘छात्रों की गूंज’ के बाद अब ‘बालाघाट’ में सियासी संग्राम

 

‘छात्रों की गूंज’ के बाद अब ‘बालाघाट’ में सियासी संग्राम

—राहुल गांधी का 13 दिन में दूसरा दौरा..1 अक्टूबर मप्र आएंगे..सियासत तेज

मध्यप्रदेश की सियासत में राहुल गांधी का दौरा एक बार फिर हलचल बढ़ाने जा रहा है..19 सितंबर को इंदौर में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम के बाद अब 1 अक्टूबर को राहुल गांधी बालाघाट पहुंचेंगे..यानी महज 13 दिन के भीतर मध्यप्रदेश में राहुल गांधी का यह दूसरा दौरा होगा। इस बार मुद्दा छात्र और युवा नहीं, बल्कि बैगा आदिवासी बहुल इलाकों में बच्चों की मौत और स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़े सवाल हैं। राहुल गांधी बालाघाट के बैहर और बिरसा क्षेत्र के प्रभावित गांवों में जाकर मृत बच्चों के परिजनों से मुलाकात करेंगे। कांग्रेस नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार के मुताबिक, राहुल गांधी परिवारों से जमीनी हालात समझेंगे और यह जानने की कोशिश करेंगे कि सरकारी योजनाओं का लाभ प्रभावित आदिवासी परिवारों तक क्यों नहीं पहुंच पाया।

राहुल गांधी के इस दौरे को केवल एक संवेदना यात्रा के तौर पर देखना मुश्किल है..क्योंकि इसके पहले इंदौर में भी उनका कार्यक्रम सीधे युवाओं, रोजगार, परीक्षा और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े सवालों पर केंद्रित था। ‘छात्रों की गूंज’ में प्रतियोगी परीक्षाओं, भर्ती में देरी, बेरोजगारी और शिक्षा व्यवस्था को लेकर छात्रों ने सवाल उठाए थे। राहुल गांधी ने अपने भाषण में व्यवस्था पर तीखे सवाल खड़े किए और छात्रों को सवाल पूछने वाला वर्ग बताते हुए शिक्षा और रोजगार के मुद्दों को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में रखा।

अब बालाघाट का मुद्दा इस राजनीतिक नैरेटिव को शहरों से निकालकर आदिवासी अंचल तक ले जाने का मौका देता है। इंदौर में जहां राहुल ने युवा और छात्र वर्ग से संवाद किया, वहीं बालाघाट में वे आदिवासी परिवारों के बीच होंगे। इस लिहाज से दोनों दौरों के बीच एक राजनीतिक कड़ी भी दिखाई देती है..पहला दौरा युवाओं और शिक्षा-रोजगार के सवालों पर..दूसरा आदिवासी इलाकों में स्वास्थ्य, पोषण और सरकारी योजनाओं की पहुंच के सवाल पर। बालाघाट में बच्चों की मौत का मामला पहले ही प्रदेश की राजनीति में बड़ा मुद्दा बन चुका है। मीडिया रिपोर्टों में प्रभावित क्षेत्र में 30 से अधिक बच्चों की मौत की जानकारी सामने आई है। हालांकि मौतों की संख्या और कारणों को लेकर अलग-अलग दावे भी सामने आए हैं। स्वास्थ्य जांचों में किसी एक बीमारी को अकेले जिम्मेदार बताने के बजाय मलेरिया, खसरा, कुपोषण, एनीमिया, निमोनिया,डिहाइड्रेशन और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का उल्लेख किया गया है।

यही वजह है कि बालाघाट का मुद्दा अब सिर्फ स्वास्थ्य विभाग की प्रशासनिक फाइल नहीं रह गया है..यह राजनीतिक जवाबदेही का सवाल बन चुका है। विपक्ष सरकार से पूछ रहा है कि इतनी बड़ी संख्या में बच्चों के बीमार पड़ने और मौतों के बाद व्यवस्था की खामियां पहले क्यों नहीं पकड़ी गईं..दूसरी तरफ सरकार की ओर से प्रभावित क्षेत्रों में स्क्रीनिंग, इलाज, टीकाकरण और निगरानी जैसी कार्रवाई का दावा किया गया है। ऐसे में राहुल गांधी का दौरा इन दोनों दावों के बीच जमीनी तस्वीर को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला सकता है।
राहुल गांधी ने सितंबर की शुरुआत में ही बालाघाट के बच्चों की मौत का मुद्दा उठाया था। उन्होंने 30 से ज्यादा आदिवासी बच्चों की बीमारी, कुपोषण और मौत का उल्लेख करते हुए राज्य सरकार पर कार्रवाई में सुस्ती का आरोप लगाया था।

कांग्रेस के साथ लिए इस दौरे की सियासी अहमियत इसलिए भी है क्योंकि बालाघाट का इलाका आदिवासी राजनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण है। बैहर और बिरसा जैसे इलाके सीधे आदिवासी बहुल क्षेत्र से जुड़े हैं। ऐसे में मृत बच्चों के परिवारों के बीच राहुल गांधी की मौजूदगी कांग्रेस को आदिवासी मुद्दों पर सरकार को घेरने का राजनीतिक मंच देती है। कांग्रेस पहले ही आरोप लगा रही है कि सरकारी योजनाओं का लाभ जरूरतमंद परिवारों तक पर्याप्त रूप से नहीं पहुंचा। उमंग सिंघार ने यह भी कहा है कि केवल मुआवजा देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि योजनाओं की वास्तविक पहुंच और स्वास्थ्य व्यवस्था की जवाबदेही तय होना जरूरी है।

हालांकि बालाघाट का मामला केवल विपक्ष के आरोपों तक सीमित नहीं है। 29 अगस्त को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव स्वयं प्रभावित आदिवासी गांवों में पहुंचे थे और सरकार ने उस समय प्रभावित परिवारों को दो-दो लाख रुपए की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की थी। इसके बाद स्वास्थ्य और प्रशासनिक टीमों की गतिविधियां भी बढ़ीं। राष्ट्रीय संयुक्त आउटब्रेक रिस्पॉन्स टीम की जांच में बच्चों में खसरा और मलेरिया समेत कई स्वास्थ्य समस्याएं सामने आईं। इससे यह स्पष्ट होता है कि मामले की जटिलता एक ही बीमारी या एक ही कारण तक सीमित नहीं है। लेकिन राजनीति में आंकड़े जितने महत्वपूर्ण होते हैं, उससे ज्यादा महत्वपूर्ण उनका संदेश होता है..और बालाघाट में कांग्रेस इसी संदेश को पकड़ने की कोशिश में है। राहुल गांधी का गांवों तक पहुंचना इस मुद्दे को भोपाल की राजनीतिक बहस से निकालकर सीधे प्रभावित परिवारों के बीच ले जाएगा। कैमरे, स्थानीय लोगों की गवाही और परिवारों की आपबीती..इन सबके बीच सरकार से जवाब मांगने का मंच तैयार होगा।

हेडिंग
पहले पटवारी का साथ..अब उमंग पर राहुल का हाथ

सियासत में संदेश सिर्फ भाषणों से नहीं..मौजूदगी से भी दिए जाते हैं। राहुल गांधी की 13 दिन में दूसरी मध्यप्रदेश यात्रा इसी लिहाज से कई राजनीतिक संकेतों वाली है..एक दौरा पटवारी के मंच को राष्ट्रीय समर्थन देता दिखा..दूसरा सिंघार के क्षेत्र में कांग्रेस की आदिवासी राजनीति को राष्ट्रीय नेतृत्व की मौजूदगी देता दिखाई देगा। अब देखना यह होगा कि बालाघाट की जमीन से उठने वाली आवाज कांग्रेस के लिए सिर्फ एक मुद्दा बनती है..या 2028 की बड़ी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा भी बनती है। इंदौर में छात्रों की आवाज के बीच जीतू पटवारी के साथ खड़े होने के बाद अब राहुल गांधी का बालाघाट दौरा मध्यप्रदेश कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति में भी कई संदेश छोड़ता दिखाई दे रहा है। 13 दिन के भीतर राहुल गांधी का यह दूसरा मध्यप्रदेश दौरा है..लेकिन दोनों दौरों की राजनीतिक जमीन अलग है। इंदौर में युवा, छात्र, रोजगार और शिक्षा के सवाल थे..तो बालाघाट में आदिवासी समाज, स्वास्थ्य, कुपोषण और सरकारी योजनाओं की पहुंच का मुद्दा है। यही बदलाव इस दौरे को महज एक संवेदनशील मुद्दे पर राहुल गांधी की मौजूदगी से आगे ले जाता है। इंदौर के ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में राहुल गांधी की मौजूदगी को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी के लिए भी महत्वपूर्ण राजनीतिक समर्थन के तौर पर देखा गया। कार्यक्रम के जरिए पटवारी के नेतृत्व में कांग्रेस ने छात्र और युवा वर्ग से जुड़े मुद्दों को सामने रखने की कोशिश की। राहुल गांधी का मंच साझा करना और प्रदेश संगठन के मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाना प्रदेश कांग्रेस के नेतृत्व के लिए अहम संकेत था।

अब बालाघाट में राहुल गांधी का पहुंचना कांग्रेस के दूसरे महत्वपूर्ण चेहरे..नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार..के राजनीतिक क्षेत्र में पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व की मौजूदगी के तौर पर देखा जा रहा है। उमंग सिंघार आदिवासी समाज से आते हैं और मध्यप्रदेश की राजनीति में आदिवासी बेल्ट कांग्रेस की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। इस वर्ग की 47 विस सीटें आरक्षित हैं तो करीब 85 सीटों पर इस आबादी का सीधा असर है..ऐसे में राहुल गांधी का बैहर और बिरसा जैसे आदिवासी बहुल इलाकों में जाकर मृत बच्चों के परिवारों से मिलना सिंघार के लिए भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। साथ ही कांग्रेस के भीतर यह संदेश भी जाता है कि पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व प्रदेश संगठन के साथ-साथ नेता प्रतिपक्ष और आदिवासी नेतृत्व को भी बराबर अहमियत दे रहा है..और यहीं से इस दौरे की सियासी परतें गहरी होती हैं..इंदौर में पटवारी के साथ राहुल..बालाघाट में आदिवासी इलाके में राहुल। यानी प्रदेश कांग्रेस की राजनीति के दो अहम केंद्रों में राष्ट्रीय नेतृत्व की मौजूदगी। एक तरफ संगठन और युवा राजनीति..दूसरी तरफ विधानसभा में सरकार को घेरने वाला विपक्ष और आदिवासी राजनीति। दोनों दौरों के बीच सिर्फ 13 दिन का अंतर है, लेकिन राजनीतिक संदेश अलग-अलग सामाजिक और संगठनात्मक समूहों तक पहुंचता है। राहुल गांधी के इस दौरे का असर केवल कांग्रेस के भीतर नहीं देखा जाएगा। मध्यप्रदेश में 2028 की विधानसभा राजनीति की तैयारी के बीच आदिवासी क्षेत्रों पर सभी दलों का फोकस बढ़ना स्वाभाविक है। ऐसे में राहुल गांधी का बालाघाट दौरा कांग्रेस के लिए आदिवासी बेल्ट में राजनीतिक सक्रियता बढ़ाने का अवसर है। खासकर ऐसे समय में जब पार्टी संगठन, नेतृत्व और जमीनी नेटवर्क को फिर से मजबूत करने की कोशिश कर रही है।

कुल मिलाकर मध्यप्रदेश की सियासत में फिलहाल दो तारीखें खास हो गई हैं..19 सितंबर 2026 और 1 अक्टूबर 2026। एक तारीख पर छात्रों की आवाज गूंजी..दूसरी तारीख पर आदिवासी अंचल की पीड़ा राजनीतिक बहस के केंद्र में होगी। लेकिन कांग्रेस के लिए यह अंतर मुद्दों को जोड़ने का और सरकार के लिए जवाबदेही के सवालों का अंतर बन सकता है। बालाघाट में राहुल गांधी की मुलाकातों के बाद सियासी गर्मी कितनी बढ़ती है, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि प्रभावित परिवार क्या कहते हैं, प्रशासन के आंकड़े क्या बताते हैं और सरकार उन सवालों का क्या जवाब देती है।

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