आदिवासियों के आशियानों पर सियासी रार..आमने-सामने..’शिवराज.’ और ‘सरकार’

सवाल कब्जे का भी और कार्रवाई की प्रक्रिया का भी

—शिवराज ने बताया अन्याय, सीएम मोहन ने जांच का भरोसा देकर कहा..दूध का दूध, पानी का पानी हो जाएगा.

मध्यप्रदेश के सीहोर जिले के कोसमी गांव में 12 बारेला आदिवासी परिवारों के मकानों पर बुलडोजर चलने का मामला अब वन भूमि से बेदखली की कार्रवाई तक सीमित नहीं रहा..इसने भाजपा के दो बड़े चेहरों— केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव— को अलग-अलग सवालों के केंद्र में ला खड़ा किया है.. शिवराज जहां अपने क्षेत्र के आदिवासियों के साथ अन्याय होने का दावा करते हुए कार्रवाई पर सवाल उठा रहे हैं, वहीं मुख्यमंत्री ने जांच कराने की बात कहकर साफ किया है कि मामले में तथ्यों के आधार पर स्थिति स्पष्ट की जाएगी..उनका संदेश है..जांच होगी, दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा.

यह विवाद इसलिए भी अहम है क्योंकि दोनों नेता भाजपा से हैं, लेकिन इस मामले में उनकी भूमिका और सार्वजनिक संदेश अलग-अलग दिखाई दे रहे हैं..एक तरफ प्रभावित परिवारों के हक और कार्रवाई की वैधता का सवाल है, तो दूसरी तरफ वन भूमि पर कथित अतिक्रमण हटाने की कानूनी प्रक्रिया..अब असली परीक्षा यह है कि जांच इन दोनों पहलुओं पर कितनी स्पष्टता से जवाब देती है.

शिवराज की आक्रामकता के पीछे क्या है?

11 अक्टूबर को सीहोर जिले के कोसमी गांव के पास वन विभाग ने 12 बारेला आदिवासी परिवारों के मकान तोड़ दिए.. इसके बाद केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान मौके पर पहुंचे और कार्रवाई को अवैध बताते हुए आदिवासी परिवारों के साथ अन्याय होने का आरोप लगाया..उनका यह कहना कि मेरे क्षेत्र में जुल्म की इंतिहा हुई, मामले को सीधे राजनीतिक और प्रशासनिक जवाबदेही के सवाल से जोड़ता है..शिवराज की नाराजगी का एक अहम पहलू स्थानीय प्रशासन और वन अमले की कार्यशैली को लेकर उठे सवाल हैं.. ग्रामीणों का आरोप है कि वे 2004 से इस इलाके में रह रहे हैं.. उनके पास 2004 और 2008 की दंड पर्चियां हैं और उन्होंने वन अधिकार कानून के तहत पट्टे के लिए दावा भी किया है..ग्रामीणों के मुताबिक, मामला अदालत में लंबित है..उनका यह भी आरोप है कि अफसर इतने बड़े हो गए हैं कि अब शिवराज की बात भी नहीं सुनते..यदि इन दावों में तथ्य हैं, तो सवाल केवल अतिक्रमण हटाने का नहीं, बल्कि वर्षों से रह रहे परिवारों के दावों, कानूनी प्रक्रिया और प्रशासनिक संवेदनशीलता का भी है..शिवराज का आक्रामक रुख इसी मानवीय पक्ष को सामने लाने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है..हालांकि,उनके आरोपों की पुष्टि जांच और उपलब्ध दस्तावेजों से ही हो सकेगी.

वन विभाग का पक्ष भी जांच के दायरे में

दूसरी तरफ, वन विकास निगम का कहना है कि कार्रवाई कानूनी प्रक्रिया के तहत की गई..निगम के मुताबिक, संबंधित जमीन रिजर्व फॉरेस्ट का हिस्सा है और 12 लोगों ने करीब 31.48 हेक्टेयर वन भूमि पर कब्जा कर पौधों को नुकसान पहुंचाया..निगम का दावा है कि इस जमीन पर पहले सागौन के पौधे लगाए गए थे और बाद में कथित कब्जे के संबंध में वन अपराध के प्रकरण दर्ज किए गए..निगम के अनुसार, दिसंबर 2025 में नोटिस जारी किया गया और 7 सितंबर 2026 को बेदखली का अंतिम आदेश दिया गया. स्थानीय वन अमले का दावा है कि कार्रवाई से पहले परिवारों को सामान निकालने का समय दिया गया और पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी कराई गई.यानी प्रशासन का पक्ष है कि कार्रवाई अचानक नहीं, बल्कि नोटिस और आदेश के बाद हुई..लेकिन ग्रामीणों के पुराने निवास, उनके दस्तावेज, वन अधिकार के दावे और अदालत में लंबित मामले की स्थिति भी उतनी ही महत्वपूर्ण है..किसी जमीन पर कब्जे का दावा और उस जमीन पर कानूनी अधिकार का प्रश्न एक ही बात नहीं हैं.

सीएम डॉ मोहन यादव की तटस्थता की कसौटी

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने जांच कराने और तथ्यों के आधार पर स्थिति स्पष्ट करने की बात कहकर तत्काल किसी एक पक्ष के दावे को अंतिम सत्य मानने से परहेज किया है..उनका यह रुख प्रशासनिक स्तर पर निष्पक्ष जांच की जरूरत को रेखांकित करता है..’दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा’..यह केवल एक बयान नहीं, बल्कि सरकार के सामने जवाबदेही का वादा भी है..अब चुनौती दोहरी है..पहली, यदि वन भूमि पर अवैध कब्जा हुआ है तो उसके तथ्य और कानूनी आधार सामने आएं..जो वन विभाग सामने रख रहा है..दूसरी, यदि बेदखली की प्रक्रिया में किसी परिवार के अधिकारों, दावों या निर्धारित प्रक्रिया की अनदेखी हुई है, तो उसकी भी पहचान हो..जांच तभी निष्पक्ष मानी जाएगी.

एसटी आयोग का नोटिस, सरकार के लिए अगली परीक्षा

आदिवासी परिवारों के मकानों पर बुलडोजर चलने के मामले में अनुसूचित जनजाति आयोग की ओर से सरकार को नोटिस दिया जाना विवाद को एक और महत्वपूर्ण मोड़ देता है..अब सरकार से कार्रवाई और प्रभावित परिवारों के अधिकारों से जुड़े सवालों पर जवाब मांगा जा रहा है..आयोग की पड़ताल और सरकारी जांच के निष्कर्ष इस मामले की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण हो सकते हैं.

सांच को नहीं आंच..लेकिन सच सामने आना जरूरी

इस पूरे विवाद में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं कि केंद्रीय मंत्री शिवराज और सीएम डॉ मोहन में कौन किसके सामने खड़ा है..असल सवाल यह है कि कोसमी के उन 12 परिवारों के साथ वास्तव में क्या हुआ, जिनके मकान ढहा दिए गए.. क्या कार्रवाई पूरी तरह नियमानुसार हुई? क्या ग्रामीणों के दावों और लंबित कानूनी प्रक्रिया पर उचित विचार किया गया? और यदि वन भूमि पर अतिक्रमण था, तो क्या उसे हटाने की प्रक्रिया में प्रभावित परिवारों के अधिकारों का ध्यान रखा गया? शिवराज का बयान राजनीतिक बहस को तेज कर रहा है, जबकि मोहन यादव का जांच का भरोसा सरकार को तथ्यों के आधार पर जवाब देने की जिम्मेदारी सौंपता है..दोनों के बीच उभरा यह अंतर भाजपा के भीतर किसी बड़ी दरार का प्रमाण अपने आप नहीं है, लेकिन यह जरूर दिखाता है कि आदिवासी हितों और प्रशासनिक कार्रवाई के सवाल पर सार्वजनिक जवाबदेही कितनी महत्वपूर्ण है…कोसमी में उजड़े आशियानों का विवाद तभी थमेगा, जब बयानबाजी से आगे बढ़कर तथ्यों के आधार पर न्याय और जवाबदेही सुनिश्चित होगी.

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