कांग्रेस का शक्ति प्रदर्शन,विपक्ष की एकजुटता और सड़क पर सियासी संग्राम; चुनौती सिर्फ राहुल की रैली की सफलता नहीं, भाजपा के जवाब की भी!
दिल्ली का रामलीला मैदान एक नवंबर को महज राजनीतिक रैली का मंच नहीं, बल्कि सत्ता और विपक्ष के बीच बढ़ते संघर्ष की नई प्रयोगशाला बनने जा रहा है। राहुल गांधी ने रैली टालने की मांग ठुकराकर संकेत दे दिया है कि कांग्रेस अब सड़क की सियासत से पीछे हटने को तैयार नहीं। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने पर तीस सेकंड में आंदोलन खत्म करने की उनकी चुनौती ने राजनीतिक तापमान और बढ़ा दिया है। सवाल यह नहीं कि राहुल कितनी भीड़ जुटाएंगे, बल्कि यह है कि उस भीड़ से निकलने वाला संदेश भाजपा के लिए कितनी बड़ी चुनौती बनेगा?
भीड़ जुटाने से बड़ी चुनौती,भरोसा बढ़ाने की!
कांग्रेस की तैयारी केवल रामलीला मैदान भरने तक सीमित नहीं दिखाई देती। पार्टी मताधिकार, चुनाव आयोग की निष्पक्षता और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर सवालों को व्यापक जनआंदोलन का स्वरूप देना चाहती है। मल्लिकार्जुन खड़गे की सक्रियता और INDIA गठबंधन के सहयोगियों की संभावित भागीदारी इस रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। हालांकि गठबंधन की वास्तविक एकजुटता मंच पर नेताओं की मौजूदगी से नहीं, आंदोलन के बाद साझा राजनीतिक कार्यक्रम से साबित होगी।
राहुल की रणभेरी,भाजपा की जवाबदेही?
भाजपा के सामने चुनौती दोहरी है। पहली, कांग्रेस के आरोपों का तथ्यात्मक और राजनीतिक जवाब देना। दूसरी, लोकतंत्र बचाने के विपक्षी नारे के मुकाबले अपना संदेश जनता तक पहुंचाना। भाजपा अराजकता और कानून-व्यवस्था को मुद्दा बनाकर कांग्रेस की घेराबंदी कर रही है। लेकिन सवाल यह भी है कि सत्ता में रहते हुए भाजपा विपक्ष के आंदोलन को केवल अव्यवस्था बताकर उसके राजनीतिक प्रभाव को कितना सीमित कर पाएगी?
सड़क पर संघर्ष, सत्ता के सामने सवाल!
व्यापारियों की नाराजगी राहुल की रणनीति का कमजोर पक्ष बन सकती है। वहीं रैली टालने से इनकार उनके समर्थकों में संघर्ष का संदेश मजबूत कर सकता है। राजनीतिक जोखिम दोनों तरफ हैं। कांग्रेस को जनसमर्थन बढ़ाने के साथ जनअसुविधा से बचना होगा, जबकि भाजपा को यह सुनिश्चित करना होगा कि उसका विरोध विपक्ष के लोकतांत्रिक अधिकारों के खिलाफ दिखाई न दे।
एक नवंबर के बाद किसकी बढ़ेगी मुश्किल?
राहुल के सामने चुनौती भीड़ को स्थायी राजनीतिक समर्थन में बदलने की है। खड़गे और सहयोगी दलों के सामने गठबंधन की विश्वसनीयता साबित करने की परीक्षा है। भाजपा के सामने सवाल है कि यदि रामलीला मैदान से उठी आवाज राज्यों तक पहुंची, तो उसका मुकाबला किस रणनीति से होगा?
असल में एक नवंबर कांग्रेस की ताकत का प्रदर्शन ही नहीं,भाजपा की राजनीतिक प्रतिक्रिया की भी परीक्षा है। राहुल पीछे हटने को तैयार नहीं, लेकिन क्या भाजपा इस चुनौती को केवल अराजकता का नाम देकर टाल पाएगी?यही रामलीला मैदान की राजनीति का सबसे बड़ा सवाल है।




